महिला मंडल उदयपुर : एक तथ्यपरक एवं यथार्थ आधारित यात्रा (1935–वर्तमान)
महिला मंडल, उदयपुर की स्थापना 1935 में समाजसेवी पंडित दयाशंकर श्रोत्रिय द्वारा उस समय की सामाजिक आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए की गई थी। यह वह काल था जब मेवाड़ क्षेत्र में महिला शिक्षा की पहुँच सीमित थी, और सार्वजनिक जीवन में महिलाओं की भागीदारी बहुत कम दिखाई देती थी। ऐसे वातावरण में महिला मंडल का गठन मुख्य रूप से महिलाओं के लिए सुरक्षित सामाजिक स्थान, और शिक्षा व व्यावहारिक कौशल उपलब्ध कराने के उद्देश्य से किया गया।
स्थापना के शुरुआती वर्षों में, संगठन ने औपचारिक विद्यालय जैसे ढाँचे के बजाय छोटे समूहों, बैठकें और घरेलू शिक्षा केन्द्रों के रूप में काम प्रारंभ किया। स्थानीय मोहल्लों से महिलाएँ यहाँ आकर बुनियादी साक्षरता, सिलाई-कढ़ाई, गणित, गृह प्रबंधन जैसे उपयोगी कौशल सीखती थीं। यह गतिविधियाँ उस समय की सामाजिक जरूरतों और उपलब्ध संसाधनों के अनुरूप थीं।
1940 और 1950 के दशकों में जब शिक्षा के अवसर बढ़ने लगे, महिला मंडल ने अपनी गतिविधियों को सांस्कृतिक कार्यक्रमों, बाल शिक्षा गतिविधियों, स्वास्थ्य जागरूकता, और महिला समुदाय के लिए प्रशिक्षण कार्यशालाओं तक विस्तारित किया। यह विस्तार उस समय के सरकारी और गैर-सरकारी प्रयासों के अनुरूप था, जिनका उद्देश्य महिलाओं और बच्चों के विकास को बढ़ावा देना था।
समय के साथ, इस स्थान का उपयोग स्थानीय समुदाय द्वारा सामाजिक बैठकों, शिक्षण सत्रों, और सांस्कृतिक आयोजनों के लिए भी होने लगा। उपलब्ध ऐतिहासिक स्मृतियों और स्थानीय दस्तावेज़ीकरण के अनुसार, महिला मंडल ने मुख्य रूप से समुदाय आधारित कार्य किए—जैसे महिलाओं का समूह सहयोग, कौशल विकास, और सामाजिक जागरूकता।
आज, लगभग नौ दशकों बाद भी, महिला मंडल उदयपुर एक स्थानीय सामुदायिक संस्था के रूप में कार्य करता है, जो लगातार महिलाओं और बच्चों के लिए शिक्षा, प्रशिक्षण और सामाजिक सहभागिता के अवसर प्रदान करता रहा है। इसकी यात्रा इस बात का प्रमाण है कि छोटे स्तर का सामुदायिक प्रयास भी लंबे समय में समाज के सांस्कृतिक ढाँचे को प्रभावित कर सकता है।