संस्था के उद्देश्‍य

1. शैक्षिक :
औपचारिक तथा अनौपचारिक शिक्षा के द्वारा महिलाओं तथा कन्याओं के लिए शिक्षण संस्थाओं को स्थापित करना। शिक्षा के साथ व्यावसायिक एवं औद्योगिक प्रशिक्षण देना। इसके लिए विद्यालयों, पुस्तकालयों, वाचनालयों की स्थापना करना ताकि महिला समाज अन्य वर्गों के साथ कदम मिलाकर राष्ट्रीय जीवन धारा से जुड़ सके।

2. सामाजिक :
महिलाओं को अपने सामाजिक एवं राष्ट्रीय उत्तरदायित्वों के प्रति सजग करना और उनमें व्याप्त सामाजिक कुरीतियों, रूढ़ियों का उन्मूलन करना जिससे वे अपना समाज में स्थान बना सकें।

3. बालहित एवं सुरक्षा :
महिलाओं को बच्चों के प्रति उत्तरदायित्व की शिक्षा देना, बच्चों के लिए उनकी प्रारम्भिक निर्माण की अवस्था में शैक्षिक सुविधाओं को उपलब्ध कराना, उनके कल्याण तथा सुरक्षा के लिए संस्थाओं का प्रबंध करना और उपेक्षित व निराश्रित बालिकाओं के लिए सुरक्षा गृह का स्थापना करना।

4. आर्थिक विकास :
महिलाओं को व्यावसायिक प्रशिक्षण देना, प्रशिक्षण संस्थाओं की स्थापना करना, रोजगार उपलब्ध कराना और आत्मनिर्भरता के साधन जुटाना।

5. स्वास्थ्य और स्वच्छता :
महिलाओं को प्रसूति पूर्व तथा प्रसव बाद सेवाओं के बारे में प्रशिक्षण देना। प्रसूति देखरेख के साधन उपलब्ध कराना और उनको परिवार कल्याण के बारे में जानकारी देना।

6. सांस्कृतिक एवं सामाजिक :
सांस्कृतिक एवं राष्ट्रीय पर्वों से महिलाओं को परिचित कराने के लिए इनका आयोजन करना। प्रदर्शनियों, मेलों, सेमिनारों, गोष्ठियों और सांस्कृतिक, सांगीतिक, नाट्य, शैक्षिक कार्यक्रमों एवं भाषण मालाओं का आयोजन करना तथा “नारी जागरण, सांस्कृतिक जागरण” साहित्य को गीतों व प्रकाशन करना।


“नारी का सम्मान जहाँ है, संस्कृति का उद्यान वहाँ है।”

इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए स्थानीय समाज सेवी एवं प्रबुद्धशील पुरूषों के सहयोग से उक्त संस्थान की स्थापना के सम्बन्ध में आयोजित एक सार्वजनिक सभा में 10 नवम्बर 1935 में महिला मण्डल उदयपुर की स्थापना हुई। तब राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने हार्दिक प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा :

“राजस्थान के बनाओ और सेविकाएँ तैयार करो।
ऐसे शुभ काम में मेरा हार्दिक आशीर्वाद है।”